भारतीय रेल और जनसामान्य की समस्याएं
भारतीय रेल और जनसामान्य की स्थिति
देश की जीवनरेखा कहलाने वाली भारतीय रेल ने 1853 में मुंबई से ठाणे की पहली यात्रा से लेकर आज तक लंबा सफर तय किया है और यह सफर निरन्तर जारी है। रेल का यह दुनिया का सबसे बड़ा नेटवर्क है, जो रोजाना लगभग 2.31 करोड़ यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाता है। भारतीय जन मानस के मन में भारतीय रेल को लेकर एक आत्मीय बोध है चूंकि लगभग हर भारतीय की कोई एक याद और अनुभूति जुड़ी हुई है। लेकिन हाल के वर्षों में रेलवे का व्यवसायीकरण, प्रीमियम ट्रेनों पर फोकस, और खानपान के निजीकरण ने आम जनता को ना केवल निराश किया है बल्कि जन सामान्य के लिए कई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। ट्रेनों का समय पर न चलना, टिकटों की लंबी वेटलिस्ट और मजबूरी में साधारण ठूंस कर भरे गए जैसे यात्री, और बिगड़ती सेवाएं यात्रियों का भरोसा तोड़ रही हैं। जब इसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट के भाव से चलाया जाता था तब वेटलिस्ट अधिक होने पर नया डिब्बा जोर कर राहत दी जाती थी, पर अब शायद इस तरह का कोई चलन नहीं बचा है।
बेशक रेलवे का व्यवसायीकरण सरकार की आत्मनिर्भरता और मुनाफे की नीति का हिस्सा है और इसी कड़ी में वंदे भारत, तेजस जैसी ट्रेनें आधुनिक सुविधाओं का दावा करती हैं, लेकिन इनका किराया इतना ज्यादा है कि ये आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं। आपात परिस्थितियों में हवाई यात्रा भी अब कोई पर्याय नहीं रही है, रेलवे के तत्काल टिकट बंद होते ही हवाई टिकट की कीमतें कम से कम 20% बढ़ तक जाती हैं, यहां तक कि बुकिंग करते करते ही एयरलाइंस द्वारा किराया बढ़ा देने की सूचना आ जाती है। यात्रा टिकटों का यह तरीका यात्रियों को मिलकर लूटने का व्यवसाय बन चुका है और व्यवसायिक प्राथमिकता ही हावी है।
प्रीमियम ट्रेनों को प्राथमिकता देने के लिए सामान्य ट्रेनें रद्द हो रही हैं या उनके सामान्य या स्लीपर कोच घटाए जा रहे हैं। जन साधारण के लिए स्लीपर क्लास, जो पहले आम यात्रियों का सहारा थी, बोगियां अब दिन-ब-दिन कम होती जा रही है। इन डिब्बों में रखरखाव का भारी अभाव है—गंदगी, टूटी सीटें, और खराब शौचालय आम हैं। हाल ही में सैनिकों ने स्लीपर कोच की बदहाल स्थिति के कारण इसमें बैठने से इनकार कर दिया, जो बदहाली को उजागर करता है। नतीजा, स्लीपर और सामान्य कोच में भीड़भाड़ असामान्य रूप से बढ़ी है, और गरीब-मध्यम वर्ग के लिए यात्रा मुश्किल हो गई है।
ट्रेनों का समय पर न चलना भी बड़ा मुद्दा है। माल ढुलाई और प्रीमियम ट्रेनों को रास्ता देने के लिए सामान्य ट्रेनें घंटों लेट होती हैं। एक मीडिया पोस्ट में शिकायत थी, “कोयला ढुलाई के लिए यात्री ट्रेनें रद्द कर दी जाती हैं।” राजधानी, शताब्दी जैसी ट्रेनों की गुणवत्ता भी गिरी है। पहले इनमें बेहतर खानपान और साफ-सफाई मिलती थी, अब इस तरह की शिकायतें बढ़ी हैं।
खानपान का निजीकरण रेलवे की सबसे बड़ी चूक साबित हुआ है। पहले पैंट्री कार में ताजा खाना बनता था, अब निजी ठेकेदार बासी, अस्वच्छ भोजन परोसते हैं। कीड़े मिलने, खराब और पुरानी पैकेजिंग की शिकायतें आम हैं। खानपान की कीमतें भी आसमान छू रही हैं—एक थाली 50-70 रुपये से बढ़कर 150-200 रुपये की हो गई वो भी बिना गुणवत्ता सुधारे।
टिकट बिक्री का निजीकरण और डायनामिक फेयर ने हालात और खराब किए हैं। IRCTC की वेबसाइट अक्सर क्रैश कर जाती है, और तत्काल टिकट खुलते ही वेटलिस्टेड हो जाते हैं। विभिन्न प्लेटफार्म ऊंची कीमतों कन्फर्म टिकट दिलाने का दावा करते हैं। डायनामिक प्राइसिंग और टिकट गारंटी जैसे निजी प्लेयर्स की मनमानी से किराया हवाई यात्रा जितना हो जाता है।
सुरक्षा भी चिंता का विषय है। सिलीगुड़ी जैसी दुर्घटनाएं सिग्नल विफलताओं और पुराने ढांचे की खामियों को दिखाती हैं। ‘कवच’ जैसी तकनीक का वादा किया जाता है, लेकिन कार्यान्वयन में कमी है। ग्रामीण इलाकों में रेल सेवाएं उपेक्षित हैं, जबकि वंदे भारत जैसे प्रोजेक्ट बड़े शहरों और अमीर वर्ग को प्राथमिकता दे रहे हैं।
रेलवे को सामान्य जन को ध्यान में रखते हुए अपनी प्राथमिकताएं दुरुस्त करनी चाहिए। स्लीपर और जन साधारण कोच की संख्या बढ़ाने, उनके रखरखाव में सुधार, टिकट बुकिंग को पारदर्शी बनाने, खानपान की गुणवत्ता पर निगरानी रखने, और सुरक्षा तकनीकों को जल्द लागू करने की जरूरत है। डायनामिक प्राइसिंग और हवाई किराए को नियंत्रित कर किफायती यात्रा सुनिश्चित करवाना समय की आवश्यकता है। रेलवे का आधुनिकीकरण जरूरी है, लेकिन यह आम जनता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। केवल तभी रेलवे सचमुच भारत की जीवनरेखा और जनता का यातायात का लोकप्रिय साधन बनी रहेगी।
युगल पाण्डेय, नागपुर